शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

ऑटोग्राफ

वो बच्ची छह-सात साल की होगी। मेरे बॉस की बेटी है। शाहरूख खान जब मेरे दफ्तर में आए थे, तो वो देखने आई थी। रात के तकरीबन 12 बजे। एक घंटे से ज्यादा तक कार्यक्रम चला। दीपिका भी थी। फरहा खान भी थी। वो टकटकी लगाए बैठी रही। पूरा कार्यक्रम देखा। मस्ती की। इतनी खुश थी, मानों वो अपनी सपनों की परीलोक में उतर आई हो। प्रोग्राम खत्म होने को हुआ। वो बच्ची शाहरुख के पास पहुंच गई। शाहरुख ने उसके साथ डांस किया। फिर एक-एक कर कई बच्चे शाहरूख की ओर दौड़ पड़े। ऑटोग्राफ लेने के लिए। उस बच्ची को भी ऑटोग्राफ चाहिए था। जो नहीं मिला। दो-चार बच्चे इसमें जरूर कामयाब हो गए। लेकिन वो बच्ची निराश रह गई। शाहरुख चले गए। लेकिन वो रूठ गई। रोने लगी। उसको ऑटोग्राफ चाहिए था। शाहरुख का ही ऑटोग्राफ चाहिए था। और उसकी अपनी डायरी पर ही ऑटोग्राफ चाहिए था। ऑटोग्राफ नहीं मिलने के गम के आगे उसका शाहरूख के साथ डांस की खुशी का कोई मायने नहीं था।

वो रोती रही। उसके पापा उसे समझाते रहे। दूसरे लोग उसे समझाते रहे। लेकिन उसकी आंखें धारप्रवाह बहती जा रही थी। क्योंकि उसे ऑटोग्राफ चाहिए था। उसको इस बात से कोई फर्क नहीं था कि शाहरुख ने उसके साथ, सिर्फ उसके साथ डांस किया। डांस का वीडियो उसके पास है। लेकिन उसे तो सिर्फ और सिर्फ ऑटोग्राफ चाहिए था। जो नहीं मिला। उसे मनाने को तमाम कोशिश उस वक्त नाकामयाब हो गई। पता नहीं बाद में उसके पापा/ मम्मी ने कैसे समझाया होगा।

खैर, फिर मेरे दिमाग में ये सवाल आया कि कोई किसी का ऑटोग्राफ क्यों लेता है? किसी का ऑटोग्राफ मिलने या न मिलने से क्या फर्क पड़ जाता है? किसी का ऑटोग्राफ किसी के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो जाता है? छोटी सी बच्ची को तो जरूर किसी ने बताया ही होगा कि किसी सेलिब्रिटीज का ऑटोग्राफ मिल जाना बहुत बड़ी बात होती है। चांद पर पहुंच जाने के बराबर। वरना छह साली की बच्ची के लिए लिए डांस से ज्यादा ऑटोग्राफ अहम नहीं होता।

ऑटोग्राफ के लिए रोते बिलखते सिर्फ वो बच्ची ही नहीं थी, हम में से कई के मन में ये कसक रह गई थी उसे शाहरुख या दीपिका का ऑटोग्राफ नहीं मिला। बड़े-बड़े ऑटोग्राफ को लेकर एक्साइटेड हो जाते है। भीड़ में धक्कम धक्का के बीच ऑटोग्राफ लेने के लिए पिल पड़ते हैं। मेरे कई मित्र अक्सर सीना चौड़ा कर बोलते हैं कि मैंने फलां का ऑटोग्राफ ले लिया। ऐसे बात करते हैं मानों एवरेस्ट पर तिरंगा फहराकर आए हों।

ऐसा क्यों होता है कि कागज के टुकड़े पर किसी के द्वारा आंख मूंदकर हस्ताक्षर कर दिया जाना, इतना मायने रखने लगता है। अक्सर देखते है कि भीड़  में जब कोई किसी को ऑटोग्राफ देता है तो वो लिखता कहीं और है, देखता कहीं और है। खुद को कहीं और महसूस करता है।

पता नहीं लोग उस आंख मूंदकर दिए गए ऑटोग्राफ को कितना सहेज कर रखते हैं। कब तक रखते हैं। और उससे क्या हासिल हो जाता है।

क्या आपको लगता है कि पांच बरस बाद जब आप उसी सेलिब्रिटी से मिलेंगे। उसे वो ऑटोग्राफ दिखाएंगे तो आपको तवज्जो मिलेगा? क्या किसी को ऐसा मिला है ? या ये सबकुछ सुनी सुनाई है?

मुझे नहीं पता। मेरे पास किसी का ऑटोग्राफ नहीं है। किसी का ऑटोग्राफ लेना कभी मैंने जरूरी समझा भी नहीं। शायद कभी होगा भी नहीं। आपको पता हो तो बताइएगा जरूर। इस ऑटोग्राफ के बारे में ज्ञानवर्धन होगा। तर्कसंगत बात अच्छी लगेगी।

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