बुधवार, 22 अप्रैल 2015

केजरीवाल के नाम चिट्ठी

अरविंद केजरीवाल जी
आप इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं? आपके सामने एक शख्स ने फांसी लगा ली और आप ताकते रह गए। वो गमछे का फंदा बनाकर फंदे में अपना गला डालकर झूल गया और आपको आह तक नहीं आई। क्या हो गया है आपको केजरीवाल जी? आपको तो खुद भीड़ के बीच से दौड़ जाना चाहिए था गजेंद्र को बचाने के लिए। आप अगर बिजली के खंभे पर चढ़ सकते हैं तो अपने कार्यकर्ताओं के बीच आप पेड़ पर क्यों नहीं चढ़ सकते हैं। वो भी तब जब एक शख्स गले से मौत को लगा रहा है। लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। मुझे पूरी उम्मीद है कि अगर आप चाहते तो गजेंद्र जिंदा बच सकता था। लेकिन आप तो किसान के फंदे को देखते हुए किसान और किसानी पर सियासत कर रहे थे। आप तो मोदी के साथ सियसत का खेल खेल रहे थे। ऊपर से आप कह रहे हैं कि दिल्ली पुलिस को देखना चाहिए। कोई मर रहा है और आप  हैं कि आप नहीं आप कर रहे हैं। ये तो बेशर्मी की हद है केजरीवाल जी।

आप तो आप। आपके कुछ सहयोगी भी बेशर्मी के चादर ओढकर कैमरे के सामने कैसे-कैसे बोले जा रहे थे। यकीनन। आपके आदेश के बिना ऐसा मुमकिन नहीं हुआ होगा। आपने ऐसे कैसे बोलने का आदेश दिया था केजरीवाल जी। कोई कह रहा था कि अगलीबार कोई पेड़ पर चढ़कर खुदकुशी करेगा तो केजरीवाल बचाने आएंगे। तो दूसरा कह रहा था कि इसमें साजिश है। तो क्या आपलोग चाहते हैं कि आपकी हर रैली में, हर सभा में कोई फांसी पर चढ़े। गज़ब। पक्के तौर पर नेता बन गए हैं आप। आपकी पार्टी।

पता है आपको। संसद से चंद कदमों की दूरी पर नीम के पेड़ पर सफेद रंग के गमछे में सिर्फ गजेंद्र नहीं झूला। बहुत कुछ मरा आज। आम आदमी पार्टी का सिद्धांत, सोच, वो संकल्पना, वो धारणा जिसे आम लोग समझता था। सबकुछ झूल गया उस फांसी के फंदे में। खत्म हो गया सबकुछ। आपलोग वैचारिक रूप से नंगे हो गए। आप की पार्टी भी उसी परंपरागत राजनीतिक पार्टी में शुमार हो गई जिससे लोग निराश है। जिसके विकल्प के तौर पर आपको लोगों ने वोट दिया था। आप भी मजे हुए नेता बन गए। आपने लीक से हटकर रानजीति करने की कसमें खाई थी। आपने कहा था कि सियासत में नई लकीर खींचेंगे। कहां गई वो लकीर।यही सियासत करने के लिए आपने झूठों का जाल बनाया था।  

आपलोग तो समाज सेवा करने आए थे न केजरीवाल जी। आपकी टीम के हर सदस्य खुद को सबसे बड़ा त्यागी बताता है। सबसे बड़ा समाजसेवक। ऐसे ही सेवा करते हैं समाज की क्या। कोई मरता रहे और आप दूसरे के सिर ठीकरा फोड़ते रहिए। बजाय उसको बचाने की।

लोग चाहे जो कहे लेकिन मैं नहीं मानता कि कुर्सी मिलने के बाद आप बदल गए। हकीकत ये है कि आपकी असलियत यही है। आप पहले भी ऐसे ही थे। बस एक चमकदार नकाब था जो धीरे-धीरे सरकते-सरकते आज पूरी तरह गिर गया।

आज आपके और आपकी पार्टी का मकसद, उसकी सोच बेलिबास हो गई। सबकुछ नंगा हो गया। आप भी कुर्सी की खातिर कुछ भी कर सकते हैं। किसी को शूली पर चढ़ा सकते हैं। आपके लिए भी आम आदमी की जान मूली के बराबर है। आपलोगों ने माफी को हथियार बना लिया है। कुछ भी कर लो। बोल लो। कैमरे पर माफी मांग लो। इस गलती की माफी नहीं होती। इतिहास आपको माफ नहीं करेगा। 

हां एक बात और। मुझे पता है कि आपको आपकी तरह की बातें करनेवालों की चिट्ठी पसंद नहीं है। आजकल आपको मीडिया भी अच्छा नहीं लगता। मुझे विश्वास है कि अब आप सोशल साइट्स पर भी वे पोस्ट और कॉमेंट नहीं पढ़ते होंगे जो आपके मनमाफिक न हो। फिर भी सियासत के मकड़जाल में उलझे हुए एक शख्स का  बहुत बड़ा भ्रम टूटा है। सामने तो आप मिलेंगे नहीं। अगर मिले भी तो मेरी इतनी लंबी बातें सुनने के लिए आपके पास वक्त नहीं होगा। इसलिए ये चिट्ठी लिख रहा हूं। शायद उड़ते-उड़ते पहुंच जाए।

एक आम आदमी (टोपी रहित)

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