गुरुवार, 6 अगस्त 2015

जाम में फंसा हुआ शहर दिल्ली

चमकदमक और आधुनिकतावाद को जीती दिल्ली दरअसल जाम में फंसा हुआ एक शहर है। जहां सड़कों पर गाड़ियां रेंगती है। लोग घुट-घुटकर सफर करते हैं। ये तय नहीं होता कि आप वक्त पर दफ्तर या फिर घर पहुंचेंगे या फिर नहीं। आगे निकलने की होड़ में ट्रैफिक नियम तोड़ने में भी गुरेज नहीं करते। भागने के चक्कर में अक्सर एक्सिडेंट होता है। गाड़ियां टूटती है। लोग मरते हैं। इसी जाम और भीड़ की वजह से रोडरेज की घटनाएं भी होती है। 

दरअसल दिल्ली में हर बरस जनसंख्या और गाड़ियों की तादाद बेहिसाब बढ़ती जा रही है। जितनी बड़ी संख्या में लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं, उतने ही बड़े तादाद में कार-बाइक सरीखे गाड़ियां भी बढ़ रही है। गाड़ियों के अनुपात में अब भी फ्लाइओवर काफी कम हैं। लिहाजा ज्यादातर रेडलाइट पर लंबा जाम लग जाता है।

सड़क पर अगर कोई गाड़ी खराब हो जाए तो उसे हटाने की तत्काल व्यवस्था तो है लेकिन चौपट है। अगर कोई बस या फिर ट्रक चलते-चलते सड़क पर दम तोड़ दे तो उसे हटाने में काफी वक्त लग जाता है। और जब तक उसे उठाकर गैरेज तक लाया जाए या फिर ठीक किया जाता है तब तक बाकी गाड़ियां रेंगती रहती है।  

कई इलाकों में सड़क को घेरकर मेट्रो लाइन बिछाई जा रही है। गाड़ियों के चलने के लिए तकरीबन एक-तिहाई जगह बच जाती है। मेट्रो का काम दिन में भी चलता है, लिहाजा जिस जगह पर मेट्रो का काम होता है वहां गाड़ियों की स्पीड सामान्य से भी आधे या उससे काफी कम हो जाती है।

वर्ल्डक्लास सिटी बनने का ख्वाब देख रही दिल्ली में सड़क के किनारे या ये कहिए की सड़क पर दुकानदारी आम है। लोग सड़क के किनारे रेहड़ी या ठेला लगाते हैं। पैसे लेकर पुलिस आंख मूंद लेती है। पार्किंग की व्यवस्था के बावजूद कुछ पैसे बचाने के चक्कर में कई इलाकों में लोग सड़क पर ही गाड़ियां खड़ी कर देते हैं। जाहिर है सड़क सिकुड़ती चली जाती है।

स्थिति रात में भी बेहतर नहीं है। रात में 11 बजे के बाद ट्रकवालों की मनमानी चलती है। नियम-कानून को ताक पर रखकर बेहिसाब रफ्तार में सड़क पर ट्रक दौड़ता है। हैरान करनेवाली बात ये है कि पुलिस या तो होती नहीं है या फिर कहीं होती भी है तो उसे कुछ दिखता नहीं है। यानी ट्रकवालों की मनमानी को रोकनेवाला कोई नहीं होता है।

पिछले कुछ दिनों में सड़क पर हरे रंग वाली डीटीसी बसों की तादाद काफी कम हो गई है। गर्मी में वैसे भी लाल रंग की बस का हालत पतली रहती है। बाकी बची क्लस्टर बसें। जो ब्लू लाइन सरीखे है। उसमें दैनिक या फिर मासिक पास नहीं होता है। ऐसे में लोगों को डीटीसी बसों के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।


मेट्रो के शुरू होने से सड़क पर भीड़ कम तो हई है लेकिन हर जगह मेट्रो तो नहीं है। डीटीसी बसों का इस्तेमाल करना ही है। और अगर आप दिल्ली की सड़कों पर दिल्ली सरकार की बस से सफर करने के लिए निकलते हैं तो यह मानकर चलिए कि आप वक्त पर मंजिल तक पहुंच पाएंगे ये तय नहीं होता। यही सबसे बड़ी मुश्किल है और यही सबसे बड़ी सच्चीई भी।  

2 टिप्‍पणियां:

  1. कभी-कभी तो लगता है दिल्ली में ज़िन्दगी ही 'जाम' हो कर रह गई है!

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